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विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।

मानव शरीर में वायरस या विषाणु के कारण होने वाले रोगों को विषाणु जनित रोग कहते हैं। ऐसे ही रोगों के बारे में आज हम जानेंगे-

जुकाम

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
साधारण जुकाम अनेक प्रकार के विषाणुओं द्वारा होता है अर्थात विषाणु जनित रोग है। लगभग 75% मामलों में राइनोवायरस तथा शेष में अन्य वायरस द्वारा होता है। यह रोग सामान्यतया मौसम बदलते समय तथा सर्दियों में होता है। इस रोग के प्रमुख लक्षण श्वसन मार्ग की म्यूकस झिल्ली में सूजन, गले में खराश, छींकना, नाक बहना, नासाकोश में कड़ापन आदि जो लगभग एक सप्ताह तक रहते हैं, अगर खाँसी है तो दो सप्ताह तक रह सकती है। इस रोग का संक्रमण छींकने से वायु में मुक्त बिंदुकणों द्वारा होता है। इसके अलावा संक्रमित व्यक्ति द्वारा किसी वस्तू को छूने से वहाँ वायरस कण लग जाते हैं और वहाँ से स्वस्थ व्यक्ति में संक्रमण हो जाता है। इस रोग के उपचार हेतु एस्पिरिन, एंटीहिस्टेमीन , नेजल स्प्रे आदि दवाओं का प्रयोग किया जाता है।

एड्स

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
Acquired Immuno Deficiency Syndrome को ही संक्षिप्त रूप में एड्स कहा जाता है। यह रोग Human Immunodeficiency Virus अर्थात H.I.V के वजह से होता है। यह रोग संभोग, इन्फेक्टेड रक्ताधान और इन्फेक्टेड इंजेक्शन की सुई के इस्तेमाल से फैलता है। इसके रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत घट जाती है। अंततः रोगी की मृत्यु हो जाती है अर्थात यह एक प्राण घातक बीमारी है।

चेचक

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
यह एक बेहद संक्रामक रोग है। इसके रोगी को सिर, पीठ, कमर और उसके बाद पूरे शरीर में भयंकर दर्द होता है। इसके बाद शरीर पर लाल दाने पड़ जाते हैं। इसके रोगी को सभी से अलग रखना चाहिए। साथ ही घर व आस पास के लोगों को भी इसका टीका लगा देना चाहिए।

पोलियो

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
यह रोग निस्पंदन विषाणु के कारण होता है। इसका प्रभाव केंद्रीय नाड़ी जाल पर होता है। इससे रीड़ की हड्डी और आंत के कोशिकाएं नष्ट हो जाती है। इसके उपचार के लिए बच्चों को पोलियोरोधी दवा दी जाती है। पोलियो के टीके की खोज जॉन साल्क ने की थी परन्तु वह इंजेक्शन द्वारा दी जाने वाली वैक्सीन थी। इसके बाद एल्बर्ट सेबीन ने 1957 में मुख से ली जाने वाली पोलियो ड्राप की खोज की।

डेंगू ज्वर

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
यह रोग जिस वायरस के कारण होता है उसे एडीज इजिप्टी, एडीज एल्बोपिक्टस, क्यूलेक्स फैटिग द्वारा संचारित किया जाता है। इस रोग में बहुत तेज बुखार आता है और सिर, आँख, पेशी व जोड़ों में भयंकर पीड़ा होती है। इसीलिए इसे हड्डी तोड़ बुखार भी कहा जाता है।

पीलिया या हेपेटाइटिस

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
जब मानव रक्त में पित्त वर्णक अधिक मात्रा में पहुँच जाता है तो यह रोग होता है। यह मुख्यतः यकृत से संबंधित रोग है। जब यकृत में पित्त वर्णक का निर्माण अधिक मात्रा में होने लगता है तो वह यकृत शिरा के माध्यम से रक्त में प्रवेश कर जाता है।

रेबीज

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
पागल कुत्ते, भेड़िये व लोमड़ी आदि के काटने से इसके विषाणु शरीर में पहुंच जाते हैं। यह रोग सर्वप्रथम इन्ही जंतुओं में होता है। इस रोग का संक्रमण केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में होता है। इस रोग के लक्षण दो रूपों में देखने को मिलते हैं। पहले में रोगी को पानी से डर लगता है और अंत में वह कुत्ते के भौंकने की आवाज निकालने लगता है। दूसरे में रोगी को पक्षाघात, तेज बुखार, उल्टी आना और भयंकर सिर दर्द होता है। रेबीज के रोकथाम के लिए इसके टीके की खोज लुई पाश्चर ने की थी।

मेनिनजाइटिस

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
यह रोग मानव मस्तिष्क को प्रभावित करता है। रोगी को पहले तेज बुखार आता है और बाद में बेहोश हो जाता है।

ट्रेकोमा


विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।

यह आँख की कॉर्निया से संबंधित रोग है। इस रोग में आँख के कॉर्निया में वृद्धि हो जाती है जिससे रोगी निद्राग्रस्त सा लगता है। इस रोग के उपचार के लिए पेनिसिलिन और क्लोरोमाइसीटीन आदि दवाओं का प्रयोग किया जाता है।

छोटी माता

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
यह रोग भी चेचक की भाँति ही अत्यधिक संक्रामक होता है। इसमें हल्के बुखार के साथ शरीर पर पित्तिकाएँ निकल आती हैं। इसके उपचार के लिए चेचक के टीके लगवाने चाहिए।

खसरा


विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।

इस रोग का कारक मार्बेली वायरस होता है। यह वायु वाहक रोग है, इसके विषाणु श्वांस लेते समय नाक से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इसमें संपूर्ण शरीर प्रभावित होता है। प्रारंभ में आँख से पानी निकलना, ज्वर, सिर में दर्द इत्यादि देखने को मिलता है। 3-4 दिन बाद शरीर पर लाल दाने पड़ जाते हैं।

गलसुआ

विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)।
इस रोग का कारक मम्प्स वायरस है। इस रोग से मानव की लार ग्रंथि प्रभावित होती है। रोगी की लार से ही इस वायरस का प्रसार होता है। शुरुवात में सिर दर्द, कमजोरी व झुरझुरी महसूस होती है। एक दो दिन बुखार रहने के बाद कान के नीचे स्थित पैरोटिड ग्रंथि में सूजन आ जाती है। इसके उपचार के लिए नमक के पानी से सिकाई या टेरामाइसिन का इंजेक्शन दिया जाता है।

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